इक रोज़ मोमिनो तुम्हें मरना ज़रूर है / Ek Roz Momino Tumhein Marna Zaroor Hai
इक रोज़, मोमिनो ! तुम्हें मरना ज़रूर है पढ़ते रहो नमाज़ ये क़ौल-ए-रसूल है पढ़ते रहो नमाज़ तो चेहरे पे नूर है पढ़ते नहीं नमाज़ तो अपना क़ुसूर है अपने किए की आप सज़ा जल्द पाओगे पढ़ते नहीं नमाज़ जहन्नम में जाओगे तौबा करो, ख़ुदा-रा नमाज़ें पढ़ा करो मक्र-ओ-फ़रेब झूट से हर दम बचा करो पढ़ते हैं जो नमाज़ जमा'अत से सर-ब-सर तय्यार कर रहे हैं वो जन्नत में अपना घर बख्शाएँगे ख़ुदा से उसे शाह-ए-बहर-ओ-बर मुस्लिम में और बुख़ारी में लिक्खी है ये ख़बर जो तर्क की नमाज़ तो वो नास हो गया जिस ने पढ़ी नमाज़ तो वो पास हो गया पढ़ते रहो नमाज़ तो बेहतर ये काम है दीन-ए-रसूल-ए-पाक का इस से क़ियाम है मत खाओ सूद, सूद का खाना हराम है बस ये दु'आ ख़ुदा से मेरी सुब्ह-ओ-शाम है पाबंद बे-नमाज़ी को कर दो नमाज़ का और उस के दिल में शौक़ तुम भर दो नमाज़ का ऐ मोमिनो ! नमाज़ को करना न तुम क़ज़ा क़ुरआन में ये साफ़ ये कहता है किब्रिया मरने के बा'द हश्र में दूल्हा बनाएगी सेहरा निजात का यही सर पे सजाएगी ऐ मोमिनो ! नमाज़ ख़ुदा से मिलाएगी मरने के बा'द गुलशन-ए-जन्नत दिलाएगी सारी 'इबादतों में 'इबादत नमाज़ है ऐ मोमिनो ! ये दीन...