अगर तयबा की ज़ीनत गुंबद-ए-ख़ज़रा नहीं होता / Agar Taiba Ki Zeenat Gumbad-e-Khazra Nahin Hota
अगर तयबा की ज़ीनत गुंबद-ए-ख़ज़रा नहीं होता तो उस शहर-ए-हसीं का नाम भी तयबा नहीं होता अगर विर्द-ए-दुरूद-ए-पाक मक्खियाँ नहीं करतीं ज़मीं पर मक्खियों का शहद भी मीठा नहीं होता है जिस के हाथ में दामन जनाब-ए-ग़ौस-ए-आ'ज़म का नकीरों के सवालों का उसे ख़तरा नहीं होता कभी का दुश्मनों ने कर दिया होता हमें बे-घर अगर भारत की धरती पर मेरा ख़्वाजा नहीं होता सदा आती है ये अब भी मज़ार-ए-आ'ला-हज़रत से बरेली में कभी ईमान का सौदा नहीं होता जो साया उन का ढूँडे उस से ये, शो'ऐब ! कह देना अरे अंधे ! ख़ुदा के नूर का साया नहीं होता शायर: शोऐब रज़ा क़ादरी झाँसी ना'त-ख़्वाँ: शोऐब रज़ा क़ादरी झाँसी agar tayba ki zeenat gumbad-e-KHazra nahi.n hota to us shehr-e-hasee.n ka naam bhi tayba nahi.n hota agar wird-e-durood-e-paak makkhiyaa.n nahi.n karti.n zamee.n par makkhiyo.n ka shahad bhi meeTha nahi.n hota hai jis ke haath me.n daaman janaab-e-Gaus-e-aa'zam ka nakeero.n ke sawaalo.n ka use KHatra nahi.n hota kabhi ka dushmano.n ne kar diya hota hame.n be-ghar agar bhaarat...