आई फिर याद मदीने की रुलाने के लिए / Aai Phir Yaad Madine Ki Rulane Ke Liye
आई फिर याद मदीने की रुलाने के लिए दिल तड़प उट्ठा है दरबार में जाने के लिए काश ! मैं उड़ता फिरूँ ख़ाक-ए-मदीना बन कर और मचलता रहूँ सरकार को पाने के लिए ग़म नहीं छोड़ दे ये सारा ज़माना भी मुझे मेरे आक़ा तो हैं सीने से लगाने के लिए मेरे लजपाल ने रुस्वा न कभी होने दिया जब पुकारा उन्हें आए हैं बचाने के लिए ये तो बस उन का करम है कि वो सुन लेते हैं वर्ना ये लब कहाँ फ़रियाद सुनाने के लिए बख़्श दी ना'त की दौलत जो हमें आक़ा ने कितना प्यारा है वसीला उन्हें पाने के लिए फिर मुयस्सर तुझे दीदार-ए-मदीना होगा वो बुलाएँगे तुझे जल्वा दिखाने के लिए मुझ गुनहगार-ओ-ख़ताकार को महशर में, 'अदील ! होंगे मौजूद वो दामन में छुपाने के लिए शायर: अदील सुल्तानी ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद फ़सीहुद्दीन सोहरवर्दी ओवैस रज़ा क़ादरी हाजी मुहम्मद मुश्ताक़ अत्तारी aai phir yaad madine ki rulaane ke liye dil ta.Dap uTTha hai darbaar me.n jaane ke liye kaash ! mai.n u.Dta phiru.n KHaak-e-madina ban kar aur machalta rahu.n sarkaar ko paane ke liye Gam nahi.n chho.D de ye saara zamaana bhi mujhe m...