अर्श की अक़्ल दंग है चर्ख़ में आसमान है / Arsh Ki Aql Dang Hai Charkh Mein Aasman Hai
'अर्श की 'अक़्ल दंग है, चर्ख़ में आसमान है जान-ए-मुराद अब किधर हाए तेरा मकान है बज़्म-ए-सना-ए-ज़ुल्फ़ में मेरी 'अरूस-ए-फ़िक्र को सारी बहार-ए-हश्त-ख़ुल्द छोटा सा 'इत्र-दान है 'अर्श पे जा के मुर्ग़-ए-'अक़्ल थक के गिरा ग़श आ गया और अभी मंज़िलों परे पहला ही आस्तान है 'अर्श पे ताज़ा छेड़-छाड़ फ़र्श में तूर्फ़ा धूम-धाम कान जिधर लगाइए तेरी ही दास्तान है इक तेरे रुख़ की रौशनी चैन है दो जहान की इन्स का उन्स उसी से है, जान की वो ही जान है वो जो न थे तो कुछ न था, वो जो न हों तो कुछ न हो जान हैं वो जहान की, जान है तो जहान है गोद में 'आलम-ए-शबाब, हाल-ए-शबाब कुछ न पूछ ! गुलबुन-ए-बाग़-ए-नूर की और ही कुछ उठान है तुझ सा सियाह-कार कौन, उन सा शफ़ी' है कहाँ फिर वो तुझी को भूल जाएँ, दिल ! ये तेरा गुमान है पेश-ए-नज़र वो नौ-बहार, सज्दे को दिल है बे-क़रार रोकिए सर को रोकिए, हाँ यही इम्तिहान है शान-ए-ख़ुदा न साथ दे, उन के ख़िराम का वो बाज़ सिदरा से ता-ज़मीं जिसे नर्म सी इक उड़ान है बार-ए-जलाल उठा लिया, गरचे कलेजा शक़ हुआ यूँ तो ये माह-ए-सब्ज़ा-रंग नज़रों में धान-पान है ख़ौफ़ न रख, र...