ज़र्रे झड़ कर तेरी पैज़ारों के / Zarre Jhad Kar Teri Paizaron Ke
ज़र्रे झड़ कर तेरी पैज़ारों के ताज-ए-सर बनते हैं सय्यारों के हम से चोरों पे जो फ़रमाएँ करम ख़िल'अत-ए-ज़र बनें पुश्तारों के मेरे आक़ा का वो दर है जिस पर माथे घिस जाते हैं सरदारों के मेरे 'ईसा ! तेरे सदक़े जाऊँ तौर बे-तौर हैं बीमारों के मुजरिमो ! चश्म-ए-तबस्सुम रक्खो फूल बन जाते हैं अंगारों के तेरे अब्रू के तसद्दुक़ प्यारे बंद कर्रे हैं गिरिफ़्तारों के जान-ओ-दिल तेरे क़दम पर वारे क्या नसीबे हैं तेरे यारों के सिद्क़-ओ-'अदल-ओ-करम-ओ-हिम्मत में चार-सू शोहरे हैं इन चारों के बहर-ए-तस्लीम-ए-'अली मैदाँ में सर झुके रहते हैं तलवारों के कैसे आक़ाओं का बंदा हूँ, रज़ा ! बोल-बाले मेरी सरकारों के शायर: इमाम अहमद रज़ा ख़ान ना'त-ख़्वाँ: ओवैस रज़ा क़ादरी ग़ुलाम मुस्तफ़ा क़ादरी असद रज़ा अत्तारी zarre jhad kar teri paizaaro.n ke taaj-e-sar bante hai.n sayyaaro.n ke ham se choro.n pe jo farmaae.n karam KHil'at-e-zar bane.n pushtaaro.n ke mere aaqa ka wo dar hai jis par maathe ghis jaate hai.n sardaaro.n ke mere 'isa ! tere sadqe jaau.n taur be...