रुख़ दिन है या मेहर-ए-समा ये भी नहीं वो भी नहीं / Rukh Din Hai Ya Mehr-e-sama Ye Bhi Nahin Wo Bhi Nahin
रुख़ दिन है या मेहर-ए-समा, ये भी नहीं वो भी नहीं शब ज़ुल्फ़ या मुश्क-ए-ख़ुता, ये भी नहीं वो भी नहीं मुम्किन में ये क़ुदरत कहाँ, वाजिब में 'अब्दिय्यत कहाँ हैराँ हूँ ये भी है ख़ता, ये भी नहीं वो भी नहीं हक़ ये कि हैं 'अब्द-ए-इलाह और 'आलम-ए-इम्काँ के शाह बर्ज़ख़ हैं वो सिर्र-ए-ख़ुदा, ये भी नहीं वो भी नहीं बुलबुल ने गुल उन को कहा, क़ुमरी ने सर्व-ए-जाँ-फ़िज़ा हैरत ने झुँझला कर कहा, ये भी नहीं वो भी नहीं ख़ुर्शीद था किस ज़ोर पर, क्या बढ़ के चमका था क़मर बे-पर्दा जब वो रुख़ हुआ, ये भी नहीं वो भी नहीं डर था कि 'इस्याँ की सज़ा, अब होगी या रोज़-ए-जज़ा दी उन की रहमत ने सदा, ये भी नहीं वो भी नहीं कोई है नाज़ाँ ज़ोहद पर, या हुस्न-ए-तौबा है सिपर याँ है फ़क़त तेरी 'अता, ये भी नहीं वो भी नहीं दिन लह्व में खोना तुझे, शब सुब्ह तक सोना तुझे शर्म-ए-नबी ख़ौफ़-ए-ख़ुदा, ये भी नहीं वो भी नहीं रिज़्क़-ए-ख़ुदा खाया किया, फ़रमान-ए-हक़ टाला किया शुक्र-ए-करम तर्स-ए-सज़ा, ये भी नहीं वो भी नहीं है बुलबुल-ए-रंगीं रज़ा , या तूती-ए-नग़्मा-सरा हक़ ये कि वासिफ़ है तेरा, ये भी नहीं वो भी नहीं शायर: इमाम अहमद रज़ा ख़...