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वो दिन आएगा इक बार मैं मदीने जाऊँगा / Wo Din Aayega Ek Baar Main Madine Jaunga

वो दिन आएगा इक बार, मैं मदीने जाऊँगा करने रौज़े का दीदार, मैं मदीने जाऊँगा वो दिन आएगा इक बार, मैं मदीने जाऊँगा शाह-ए-मदीना, रहमत-ए-'आलम, नबियों के सरदार देखें, कब दिखलाएँ अपना नूरानी दरबार मैं तो हूँ कब से तय्यार, मैं मदीने जाऊँगा वो दिन आएगा इक बार, मैं मदीने जाऊँगा मुझ को यक़ीं है, करम करेंगे आमिना बी के लाल उन को तो मा'लूम है, वल्लाह ! मेरे दिल का हाल कहते हैं ये दिल के तार, मैं मदीने जाऊँगा वो दिन आएगा इक बार, मैं मदीने जाऊँगा देखा नहीं उन का दर अब तक, क्या होगा अंजाम ! मेरे दिल की धड़कन मुझ को देती है पैग़ाम मरने से पहले इक बार मैं मदीने जाऊँगा वो दिन आएगा इक बार, मैं मदीने जाऊँगा देख के मुझ 'आसी को उन को आ जाएगा प्यार नूरानी चादर में छुपा लेंगे उस दम सरकार ले कर जब अश्कों के हार मैं मदीने जाऊँगा वो दिन आएगा इक बार, मैं मदीने जाऊँगा क्या ग़म है कि जकड़े हुए है दूरी की ज़ंजीर मिल जाएगी मुझ को मेरे ख़्वाबों की ता'बीर जिस दिन चाहेंगे सरकार, मैं मदीने जाऊँगा वो दिन आएगा इक बार, मैं मदीने जाऊँगा है आमिना में मीम, हलीमा में मीम है मेहराब में है मीम तो म...

मैं आसी हूँ मगर तू है बड़ा ग़फ़्फ़ार या अल्लाह / Main Aasi Hun Magar Tu Hai Bada Gaffar Ya Allah

या अल्लाह ! या रहमान ! या रहीम ! या करीम ! या हय्यु ! या क़य्यूम ! या अल्लाह ! या रहमान ! या रहीम ! या करीम ! मैं 'आसी हूँ मगर तू है बड़ा ग़फ़्फ़ार, या अल्लाह ! करम से अपने कर दे मेरा बेड़ा पार, या अल्लाह ! मैं 'आसी हूँ मगर तू है बड़ा ग़फ़्फ़ार, या अल्लाह ! समा जाए मेरे दिल में मोहब्बत के तेरे जल्वे जिधर देखूँ नज़र आएँ तेरे अनवार, या अल्लाह ! मैं 'आसी हूँ मगर तू है बड़ा ग़फ़्फ़ार, या अल्लाह ! रहूँ तेरी रिज़ा पर मैं हमेशा साबिर-ओ-शाकिर न दे दुनिया का कोई ग़म मुझे आज़ार, या अल्लाह ! मैं 'आसी हूँ मगर तू है बड़ा ग़फ़्फ़ार, या अल्लाह ! फ़क़त इक तेरी रहमत है, मुझे जिस का सहारा है मैं बेकस हूँ, नहीं कोई मेरा ग़म-ख़्वार, या अल्लाह ! मैं 'आसी हूँ मगर तू है बड़ा ग़फ़्फ़ार, या अल्लाह ! तमन्ना है कि अपनी ज़िंदगी में देख लूँ फिर भी तेरे प्यारे तेरे महबूब का दरबार, या अल्लाह ! मैं 'आसी हूँ मगर तू है बड़ा ग़फ़्फ़ार, या अल्लाह ! तेरे दरिया-ए-रहमत में हो तुग़्यानी प-ए-बख़्शिश हो क़ासिम हश्र में जब हाज़िर-ए-दरबार, या अल्लाह ! मैं 'आसी हूँ मगर तू है बड़ा ग़फ़्फ़ार, या अल्लाह ! शायर: क़ासिम शाह ब...

काबा है तेरा बड़ा मोहतरम / Kaba Hai Tera Bada Mohtaram

मेरे ख़ुदा ऐ रहनुमा ! तेरे लिए ही है हम्द-ओ-सना ऐ बादशाह ! का'बा तेरा, है तेरे बंदों की जा-ए-पनाह का'बा है तेरा बड़ा मोहतरम दिखता यहाँ है निशान-ए-करम है तेरे बंदों पे तेरी 'अता जो आज करते यहाँ सर हैं ख़म लब्बैक की है लबों पे सदा ला इलाहा इलल्लाह तकबीर से है मु'अत्तर फ़िज़ा ला इलाहा इलल्लाह का'बा तेरा जिस जा आबाद है इस्लाम की जा-ए-बुनियाद है सारे जहाँ का है मर्कज़ यही दुनिया यहाँ से ही आबाद है तेरे ख़लील की ये याद है अब बुत-परस्तों से आज़ाद है का'बा है तेरा बड़ा मोहतरम दिखता यहाँ है निशान-ए-करम लब्बैक की है लबों पे सदा ला इलाहा इलल्लाह तकबीर से है मु'अत्तर फ़िज़ा ला इलाहा इलल्लाह एहराम में सब हैं इक रंग में आते नज़र सब हैं इक ढंग में कोई खड़ा है कोई दौड़ता सब हैं यहाँ अपने आहंग में अदना है कोई न आ'ला कोई दर पर तेरे हैं बराबर सभी का'बा है तेरा बड़ा मोहतरम दिखता यहाँ है निशान-ए-करम लब्बैक की है लबों पे सदा ला इलाहा इलल्लाह तकबीर से है मु'अत्तर फ़िज़ा ला इलाहा इलल्लाह गोरे भी आए हैं काले भी हैं दुख दर्द अपने सुनाने को हैं 'अरब...

कौन है जो ये इल्तिजा न करे | दिल को उन से ख़ुदा जुदा न करे तज़मीन के साथ / Kaun Hai Jo Ye Iltija Na Kare | Dil Ko Un Se Khuda Juda Na Kare With Tazmeen

कौन है जो ये इल्तिजा न करे कौन उन के लिए मरा न करे कौन रो रो के ये दु'आ न करे दिल को उन से ख़ुदा जुदा न करे बेकसी लूट ले ख़ुदा न करे 'इश्क़ का सर पे डाल कर के ग़िलाफ़ बात अहल-ए-ख़िरद ये सुन लें साफ़ काम है कौन सा शरा' के ख़िलाफ़ इस में रौज़े का सज्दा हो कि तवाफ़ होश में जो न हो वो क्या न करे रात-दिन हम गुनह में डूबे हैं जुर्म जितने हैं सारे करते हैं फिर भी आक़ा करीम ऐसे हैं ये वही हैं कि बख़्श देते हैं कौन इन जुर्मों पर सज़ा न करे 'इश्क़ ने कर दिया मुझे मशहूर उन की यादों से ज़ेहन है मा'मूर मुझ को इस बात पे है फ़ख़्र ज़रूर दिल में रौशन है शम'-ए-'इश्क़-ए-हुज़ूर काश ! जोश-ए-हवस हवा न करे ज़ख़्म सीने के सारे सीने को जो यहाँ मर रहे थे जीने को ऐ वसी ! जाम-ए-'इश्क़ पीने को ले, रज़ा ! सब चले मदीने को मैं न जाऊँ अरे ख़ुदा न करे कलाम: इमाम अहमद रज़ा ख़ान तज़मीन: सय्यिद अब्दुल वसी क़ादरी रज़वी ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद अब्दुल वसी क़ादरी रज़वी kaun hai jo ye iltija na kare kaun un ke liye mara na kare kaun ro ro ke ye du'aa na kare dil ko un se...

तमन्ना मुद्दतों की अब मिटा दे | इलाही मुझ को भी हाजी बना दे / Tamanna Muddaton Ki Ab Mita De | Ilahi Mujh Ko Bhi Haji Bana De

तमन्ना मुद्दतों की अब मिटा दे इलाही ! मुझ को भी हाजी बना दे दिखा दे वो दर-ए-का'बा दिखा दे इलाही ! मुझ को भी हाजी बना दे कभी का'बे की चादर को मैं चूमूँ कभी मैं मुल्तज़िम से जा के लिपटूँ 'अताओं पर तेरी रो कर मैं झूमूँ नसीबा तू मेरा भी जगमगा दे इलाही ! मुझ को भी हाजी बना दे का'बा मैं जाऊँ, जा कर न आऊँ का'बे में जा कर मैं मर जाऊँ रवाँ का'बे की जानिब क़ाफ़िले हैं करम के फिर से जारी सिलसिले हैं मेरी आँखों में जो आँसू भरे हैं उन्हें रुक्न-ए-यमानी का पता दे इलाही ! मुझ को भी हाजी बना दे मौला ! दिखा दे, मौला ! दिखा दे तयबा वो तयबा, का'बा वो का'बा क्या ख़ुश-नुमा है, क्या दिल-नशीं है तयबा वो तयबा, का'बा वो का'बा मेरी तमन्ना, मेरी तलब है तयबा वो तयबा, का'बा वो का'बा ये है शौक़-ए-फ़रीदी की तमन्ना हो शामिल हाजियों में नाम मेरा मेरा मस्कन बने शहर-ए-मदीना वहीं मदफ़न भी तू मेरा बना दे इलाही ! मुझ को भी हाजी बना दे शायर: शौक़ फ़रीदी ना'त-ख़्वाँ: सय्यिद मुइज़ अशरफ़ी tamanna muddato.n ki ab miTa de ilaahi ! mujh ko ...

मुझे मदीने की दो इजाज़त नबी-ए-रहमत शफ़ी-ए-उम्मत / Mujhe Madine Ki Do Ijazat Nabi-e-Rahmat Shafi-e-Ummat

मुझे मदीने की दो इजाज़त नबी-ए-रहमत शफ़ी'-ए-उम्मत ! पिलाओ बुलवा के जाम-ए-उल्फ़त नबी-ए-रहमत शफ़ी'-ए-उम्मत ! अगर नहीं मेरी ऐसी क़िस्मत सदा हुज़ूरी की पाऊँ लज़्ज़त रुलाए मुझ को तुम्हारी फ़ुर्क़त नबी-ए-रहमत शफ़ी'-ए-उम्मत ! 'अता हो मुझ को ग़म-ए-मदीना तपाँ जिगर, चाक चाक सीना बढ़े मोहब्बत की ख़ूब शिद्दत नबी-ए-रहमत शफ़ी'-ए-उम्मत ! लगाओ सीने में आग ऐसी क़रार पाए न दिल कभी भी रुलाए हर दम तुम्हारी उल्फ़त नबी-ए-रहमत शफ़ी'-ए-उम्मत ! मैं नाम पर तेरे वारी जाऊँ मैं 'इश्क़ में तेरे घर लुटाऊँ मिले वो जज़्बा, मिले वो हिम्मत नबी-ए-रहमत शफ़ी'-ए-उम्मत ! हुसैन इब्न-ए-'अली का सदक़ा हमारे ग़ौस-ए-जली का सदक़ा 'अता मदीने में हो शहादत नबी-ए-रहमत शफ़ी'-ए-उम्मत ! हर इक नबी, हर वली का सदक़ा तुझे तेरी हर गली का सदक़ा दे तयबा में मरने की स'आदत नबी-ए-रहमत शफ़ी'-ए-उम्मत ! इमाम अहमद रज़ा का सदक़ा हमारे मुर्शिद ज़िया का सदक़ा बक़ी'-ए-ग़र्क़द करो 'इनायत नबी-ए-रहमत शफ़ी'-ए-उम्मत ! वसीला ख़ुल्फ़ा-ए-राशिदीं का तमाम असहाब-ओ-ताबि'ईं का जवार जन्नत में हो 'इनायत ...

मौला तू दे सआदत हज पर बुला ले मौला / Maula Tu De Saadat Hajj Par Bula Le Maula

मौला ! तू दे स'आदत, हज पर बुला ले, मौला ! का'बे की हो ज़ियारत, हज पर बुला ले, मौला ! लाखों हैं जाने वाले, लाखों ही रह गए हैं है सब दिलों की हसरत, हज पर बुला ले, मौला ! कहने को दूर हैं हम, दिल है मगर वहाँ पर ये ख़्वाब हो हक़ीक़त, हज पर बुला ले, मौला ! हज की लगन हो दिल में, एहराम हो बदन पर लब पर हो तेरी मिदहत, हज पर बुला ले, मौला ! 'अर्फ़ात का हो मंज़र, माँगूँ दु'आएँ रो कर बख़्शिश की दे ज़मानत, हज पर बुला ले, मौला ! मुज़दल्फ़ा का हो डेरा, हो हाजियों का फेरा मुझ पर भी कर दे रहमत, हज पर बुला ले, मौला ! रहमत के इस जबल पर हाज़िर हो ये, उजागर ! ऐसी मिले इजाज़त, हज पर बुला ले, मौला ! शायर: अल्लामा निसार अली उजागर ना'त-ख़्वाँ: हाफ़िज़ अनस रज़ा अत्तारी maula ! tu de sa'aadat, hajj par bula le, maula ! kaa'be ki ho ziyaarat, hajj par bula le, maula ! laakho.n hai.n jaane waale, laakho.n hi reh gaye hai.n hai sab dilo.n ki hasrat, hajj par bula le, maula ! kehne ko door hai.n ham, dil hai magar wahaa.n par ye KHwaab ho haqeeqat, hajj par bula le,...

या रब्बना इर्हम-लना | तेरे घर के फेरे लगाता रहूँ मैं / Ya Rabbana Irhamlana | Tere Ghar Ke Phere Lagata Rahun Main

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना तेरे घर के फेरे लगाता रहूँ मैं सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना हरम में, मैं हाज़िर हुआ बन के मुजरिम ये लब्बैक ना'रा लगाता रहूँ मैं सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना मैं लेता रहूँ बोसा-ए-संग-ए-अस्वद यूँ दिल की सियाही मिटाता रहूँ मैं सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना इलाही ! मैं फिरता रहूँ गिर्द-ए-का'बा यूँ क़िस्मत की गर्दिश मिटाता रहूँ मैं सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना लिपट कर गले लग के मैं मुल्तज़म से गुनाहों के धब्बे मिटाता रहूँ मैं सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना बराहीम के नक़्श-ए-पा चूम कर मैं निगाहों से दिल में बसाता रहूँ मैं सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना हतीम-ए-हरम में नमाज़ों को पढ़ कर तेरे दर पे दुखड़े सुनाता रहूँ मैं सदा ...

जब मदीने जाएँगे हम मुस्कुराते जाएँगे / Jab Madine Jayenge Hum Muskurate Jayenge

जब मदीने जाएँगे, हम मुस्कुराते जाएँगे जब वहाँ से आएँगे, आँसू बहाते आएँगे झोलियाँ भर लेंगें उन की रहमतों से हम वहाँ फूल जितने भी खिलेंगे, हम उठाते जाएँगे सिर्फ़ आँसू हैं हमारे पास और कुछ भी नहीं हाल अपना अपनी आँखों से सुनाते जाएँगे शहर-ए-तयबा तेरा मंज़र कोई भी धुँदला न हो अपने आँसू अपनी आँखों में छुपाते जाएँगे लौट आएँगे वहाँ से हम ब-ज़ाहिर, सा'दिया ! दिल में यादों के हज़ारों घर बनाते जाएँगे ना'त-ख़्वाँ: हाफ़िज़ मज़हर क़ादरी अशरफ़ी jab madine jaaenge, ham muskuraate jaaenge jab wahaa.n se aaenge, aansu bahaate aaenge jholiyaa.n bhar lenge un ki rahmato.n se ham wahaa.n phool jitne bhi khilenge, ham uThaate jaaenge sirf aansu hai.n hamaare paas aur kuchh bhi nahi.n haal apna apni aankho.n se sunaate jaaenge shehr-e-tayba tera manzar koi bhi dhundla na ho apne aansu apni aankho.n me.n chhupaate jaaenge lauT aaenge wahaa.n se ham ba-zaahir, Saa'diya ! dil me.n yaado.n ke hazaaro.n ghar banaate jaaenge Naat-Khwaan: Hafiz Mazhar Qadri Ashrafi Ja...

या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा तू मुझे हज पे बुला / Ya Rabb-e-Mustafa Tu Mujhe Hajj Pe Bula

या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ! तू मुझे हज पे बुला आ के मैं देख लूँ आँख से का'बा तेरा या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! हज का शरफ़ हो फिर 'अता, या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ! मीठा मदीना फिर दिखा, या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ! या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ! तू मुझे हज पे बुला आ के मैं देख लूँ आँख से का'बा तेरा या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! रुख़ सू-ए-का'बा, हाथ में ज़मज़म का जाम हो पी कर करूँ मैं फिर दु'आ, या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ! या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ! तू मुझे हज पे बुला आ के मैं देख लूँ आँख से का'बा तेरा या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! रोती रहे जो हर घड़ी 'इश्क़-ए-रसूल में वो आँख दे दे, या ख़ुदा या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ! या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ! तू मुझे हज पे बुला आ के मैं देख लूँ आँख से का'बा तेरा या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! दे दे तवाफ़-ए-ख़ाना-ए-का'बा का फिर शरफ़ फ़रमा ये प...