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तेरे इश्क़ में मैं क्या हूँ दुनिया को पता क्या है / Tere Ishq Mein Main Kya Hun Duniya Ko Pata Kya Hai

तेरे 'इश्क़ में मैं क्या हूँ, दुनिया को पता क्या है पागल हूँ दीवाना हूँ, जानूँ क्या ख़ता क्या है होश अपना, ये दिल तुम पर पहले ही गवाए था इक 'अक़्ल ही आख़िर थी, अब पास बचा क्या है लगते हैं ये बे-रौनक़ जन्नत के नज़ारे सब अल्लाह-अल्लाह मदीने की पाकीज़ा फ़ज़ा क्या है हो दफ़्न मेरी मय्यत भी घोर अँधेरे में सरकार की बेटी से पूछो कि हया क्या है ना'त-ख़्वाँ: गुलफ़ाम रज़ा हस्सानी tere 'ishq me.n mai.n kya hu.n, duniya ko pata kya hai paagal hu.n deewana hu.n, jaanu.n kya KHata kya hai hosh apna, ye dil tum par pehle hi gawaae thaa ik 'aql hi aaKHir thi, ab paas bacha kya hai lagte hai.n ye be-raunaq jannat ke nazaare sab allah-allah madine ki paakeeza faza kya hai ho dafn meri mayyat bhi ghor andhere me.n sarkaar ki beTi se poochho ki haya kya hai Naat-Khwaan: Gulfam Raza Hassani Tere Ishq Mein Main Kya Hun Lyrics | Tere Ishq Mein Main Kya Hun Duniya Ko Pata Kya Hai Lyrics in Hindi | Tere Ishq Me Main Kya Hoon Lyrics | mei mai hon hu hei hai hein ha...

वो मेरा ग़नी मेरा ग़नी मेरा ग़नी है / Wo Mera Ghani Mera Ghani Mera Ghani Hai

बा-वफ़ा बा-हया, आ'ला-ओ-'आली-सफ़ा मेरा 'उस्मान वो जिस के वसीले से हर इक बात बनी है वो मेरा ग़नी, मेरा ग़नी, मेरा ग़नी है वो मेरा ग़नी, मेरा ग़नी, मेरा ग़नी है मेरा मुर्शिद, मेरा मौला, मेरा सुल्तान है 'उस्मान मेरा दाता, मेरा आक़ा , मेरी पहचान है 'उस्मान सख़ियों का सख़ी है, 'उस्मान-ए-ग़नी है सख़ियों का सख़ी है, 'उस्मान-ए-ग़नी है जो जामे'-ए-क़ुरआन है, है 'आमिल-ए-सुन्नत ता-'उम्र दिया जिस ने हमें दर्स-ए-शरी'अत वो जिस से कली दीन के गुलशन की खिली है वो मेरा ग़नी, मेरा ग़नी, मेरा ग़नी है जो फ़ख़्र-ए-अबू-बक्र है, दामाद-ए-नबी है लौ जिस से 'उमर और 'अली की भी लगी है उस सा न ज़माने में कोई आया सख़ी है वो मेरा ग़नी, मेरा ग़नी, मेरा ग़नी है 'उस्मान का दुश्मन तो नबी का भी है दुश्मन दुश्मन है ख़ुदा का, वो 'अली का भी है दुश्मन दोज़ख़ का वो हक़दार है, हक़ बात यही है वो मेरा ग़नी, मेरा ग़नी, मेरा ग़नी है हो कैसे बयाँ हज़रत-ए-'उस्मान की 'अज़मत क़ुरआन को पढ़ते हुए पाई है शहादत वो जिस की जबीं आगे न दुश्मन के झुकी है वो मेरा ग़नी, मेरा ग़नी, मेरा ग़नी है हम अ...

अल्लाह से क्या प्यार है उस्मान-ए-ग़नी का / Allah Se Kya Pyar Hai Usman-e-Ghani Ka

अल्लाह से क्या प्यार है 'उस्मान-ए-ग़नी का महबूब-ए-ख़ुदा यार है 'उस्मान-ए-ग़नी का रंगीन वो रुख़्सार है 'उस्मान-ए-ग़नी का बुलबुल गुल-ए-गुलज़ार है 'उस्मान-ए-ग़नी का गर्मी पे ये बाज़ार है 'उस्मान-ए-ग़नी का अल्लाह ख़रीदार है 'उस्मान-ए-ग़नी का क्या ला'ल शकर-बार है 'उस्मान-ए-ग़नी का क़ंद एक नमक-ख़्वार है 'उस्मान-ए-ग़नी का सरकार 'अता-पाश है 'उस्मान-ए-ग़नी का दरबार दुरर-बार है 'उस्मान-ए-ग़नी का दिल-सोख़्त-ओ-हिम्मत-जिगर अब होते हैं ठंडे वो साया-ए-दीवार है 'उस्मान-ए-ग़नी का जो दिल को ज़िया दे, जो मुक़द्दर को जिला दे वो जल्वा-ए-दीदार है 'उस्मान-ए-ग़नी का जिस आईना में नूर-ए-इलाही नज़र आए वो आईना रुख़्सार है 'उस्मान-ए-ग़नी का सरकार से पाएँगे मुरादों पे मुरादें दरबार ये दुर-बार है 'उस्मान-ए-ग़नी का आज़ाद गिरिफ़्तार-ए-बला-ए-दो-जहाँ है आज़ाद गिरिफ़्तार है 'उस्मान-ए-ग़नी का बीमार है जिस को नहीं आज़ार-ए-मोहब्बत अच्छा है जो बीमार है 'उस्मान-ए-ग़नी का अल्लाहु-ग़नी हद नहीं इन'आम-ओ-'अता की वो फ़ैज़ पे दरबार है 'उस्मान-ए-ग़नी का रुक जाएँ ...

नज़रें झुका लो पलकें बिछा लो | नाम-ए-मुहम्मद लिया जा रहा है / Nazrein Jhuka Lo Palkein Bichha Lo | Naam-e-Muhammad Liya Ja Raha Hai

नज़रें झुका लो, पलकें बिछा लो नाम-ए-मुहम्मद लिया जा रहा है होंटों पे मुस्कान अपने सजा लो नाम-ए-मुहम्मद लिया जा रहा है नज़रें झुका लो, पलकें बिछा लो नाम-ए-मुहम्मद लिया जा रहा है मेहमान है वो प्यारे नबी का आक़ा की महफ़िल में आता है जो भी पलकों पे अपनी उस को बिठा लो नाम-ए-मुहम्मद लिया जा रहा है नज़रें झुका लो, पलकें बिछा लो नाम-ए-मुहम्मद लिया जा रहा है पढ़ते रहो तुम दुरूदों की तस्बीह और यूँ करो तुम मोहब्बत की तशरीह तस्बीह को आँखों से अपनी लगा लो नाम-ए-मुहम्मद लिया जा रहा है नज़रें झुका लो, पलकें बिछा लो नाम-ए-मुहम्मद लिया जा रहा है आदम से पहले और बा'द-ए-आदम है हर ज़माना नबी का ज़माना तुम भी ज़माने के संग गुनगुना लो नाम-ए-मुहम्मद लिया जा रहा है नज़रें झुका लो, पलकें बिछा लो नाम-ए-मुहम्मद लिया जा रहा है रखना यक़ीं तुम, आएँगे आक़ा आँगन में अपने जो महफ़िल सजेगी राहों पे उन की नज़रें जमा लो नाम-ए-मुहम्मद लिया जा रहा है नज़रें झुका लो, पलकें बिछा लो नाम-ए-मुहम्मद लिया जा रहा है शायर: बाबू फ़राज़ ना'त-ख़्वाँ: नवल ख़ान nazre.n jhuka lo, palke.n bichha lo ...

अर्श की अक़्ल दंग है चर्ख़ में आसमान है / Arsh Ki Aql Dang Hai Charkh Mein Aasman Hai

'अर्श की 'अक़्ल दंग है, चर्ख़ में आसमान है जान-ए-मुराद अब किधर हाए तेरा मकान है बज़्म-ए-सना-ए-ज़ुल्फ़ में मेरी 'अरूस-ए-फ़िक्र को सारी बहार-ए-हश्त-ख़ुल्द छोटा सा 'इत्र-दान है 'अर्श पे जा के मुर्ग़-ए-'अक़्ल थक के गिरा ग़श आ गया और अभी मंज़िलों परे पहला ही आस्तान है 'अर्श पे ताज़ा छेड़-छाड़ फ़र्श में तूर्फ़ा धूम-धाम कान जिधर लगाइए तेरी ही दास्तान है इक तेरे रुख़ की रौशनी चैन है दो जहान की इन्स का उन्स उसी से है, जान की वो ही जान है वो जो न थे तो कुछ न था, वो जो न हों तो कुछ न हो जान हैं वो जहान की, जान है तो जहान है गोद में 'आलम-ए-शबाब, हाल-ए-शबाब कुछ न पूछ ! गुलबुन-ए-बाग़-ए-नूर की और ही कुछ उठान है तुझ सा सियाह-कार कौन, उन सा शफ़ी' है कहाँ फिर वो तुझी को भूल जाएँ, दिल ! ये तेरा गुमान है पेश-ए-नज़र वो नौ-बहार, सज्दे को दिल है बे-क़रार रोकिए सर को रोकिए, हाँ यही इम्तिहान है शान-ए-ख़ुदा न साथ दे, उन के ख़िराम का वो बाज़ सिदरा से ता-ज़मीं जिसे नर्म सी इक उड़ान है बार-ए-जलाल उठा लिया, गरचे कलेजा शक़ हुआ यूँ तो ये माह-ए-सब्ज़ा-रंग नज़रों में धान-पान है ख़ौफ़ न रख, र...

अगर तयबा की ज़ीनत गुंबद-ए-ख़ज़रा नहीं होता / Agar Taiba Ki Zeenat Gumbad-e-Khazra Nahin Hota

अगर तयबा की ज़ीनत गुंबद-ए-ख़ज़रा नहीं होता तो उस शहर-ए-हसीं का नाम भी तयबा नहीं होता अगर विर्द-ए-दुरूद-ए-पाक मक्खियाँ नहीं करतीं ज़मीं पर मक्खियों का शहद भी मीठा नहीं होता है जिस के हाथ में दामन जनाब-ए-ग़ौस-ए-आ'ज़म का नकीरों के सवालों का उसे ख़तरा नहीं होता कभी का दुश्मनों ने कर दिया होता हमें बे-घर अगर भारत की धरती पर मेरा ख़्वाजा नहीं होता सदा आती है ये अब भी मज़ार-ए-आ'ला-हज़रत से बरेली में कभी ईमान का सौदा नहीं होता जो साया उन का ढूँडे उस से ये, शो'ऐब ! कह देना अरे अंधे ! ख़ुदा के नूर का साया नहीं होता शायर: शोऐब रज़ा क़ादरी झाँसी ना'त-ख़्वाँ: शोऐब रज़ा क़ादरी झाँसी agar tayba ki zeenat gumbad-e-KHazra nahi.n hota to us shehr-e-hasee.n ka naam bhi tayba nahi.n hota agar wird-e-durood-e-paak makkhiyaa.n nahi.n karti.n zamee.n par makkhiyo.n ka shahad bhi meeTha nahi.n hota hai jis ke haath me.n daaman janaab-e-Gaus-e-aa'zam ka nakeero.n ke sawaalo.n ka use KHatra nahi.n hota kabhi ka dushmano.n ne kar diya hota hame.n be-ghar agar bhaarat...

शह-ए-दीं के नालैन उठाने के क़ाबिल / Shah-e-Deen Ke Nalain Uthane Ke Qabil

शह-ए-दीं के ना'लैन उठाने के क़ाबिल कहाँ मेरा सर उस ख़ज़ाने के क़ाबिल वो ख़ाक-ए-दयार-ए-हबीब-ए-ख़ुदा है कहाँ मेरी आँखें लगाने के क़ाबिल अभी वो बुला लें मुझे एक पल में मगर मैं कहाँ हूँ बुलाने के क़ाबिल ख़ुदा की क़सम वो बुलाएँगे मुझ को मैं हो जाऊँगा जब बुलाने के क़ाबिल मेरा ज़िक्र छोड़ो, तसव्वुर भी मेरा नहीं है मदीने में जाने के क़ाबिल अगर अपने आ'माल को याद कर लूँ नहीं एक पल मुस्कुराने के क़ाबिल हूँ शहर-ए-मदीना के कुत्तो का कुत्ता मैं ये भी नहीं हूँ बताने के क़ाबिल नकीरैन बस खोल दें मेरी आँखें नहीं उन को चेहरा दिखाने के क़ाबिल है जावेद फिर भी मुक़द्दर पे नाज़ाँ किया रब ने ना'तें सुनाने के क़ाबिल ना'त-ख़्वाँ: मुहम्मद अली फ़ैज़ी shah-e-dee.n ke naa'lain uThaane ke qaabil kahaa.n mera sar us KHazaane ke qaabil wo KHaak-e-dayaar-e-habeeb-e-KHuda hai kahaa.n meri aankhe.n lagaane ke qaabil abhi wo bula le.n mujhe ek pal me.n magar mai.n kahaa.n hu.n bulaane ke qaabil KHuda ki qasam wo bulaaenge mujh ko mai.n ho jaaunga jab bulaane ke qaabil mera zikr...

कुछ देर तो बैठो अहल-ए-दिल हम नूर-ए-हुदा की बात करें / Kuchh Der To Baitho Ahl-e-Dil Hum Noor-e-Huda Ki Baat Karein

कुछ देर तो बैठो, अहल-ए-दिल ! हम नूर-ए-हुदा की बात करें सरकार-ए-दो-'आलम सल्ले-'अला महबूब-ए-ख़ुदा की बात करें वो जिन से मुनव्वर दोनों जहाँ वो जिन से मिटी ज़ुल्मत शब की तोहफ़े में जिन्हें क़ुरआन मिला उन जान-ए-फ़िदा की बात करें वश्शम्स है चेहरा-ए-अनवर और वल्लैल हैं गेसू हज़रत के कौनैन की महफ़िल जिन से सजी वो सब से जुदा की बात करें अलक़ाब मिले ताहा यासीं मुज़म्मिल-ओ-मक्की-मदनी भी और उस्वा-ए-हसना जिस को कहा उस रब की सदा की बात करें ग़म-ख़्वार हैं आक़ा उम्मत के सरदार-ए-'उला हैं जन्नत के वो रहमत-ए-'आलम नूर-ए-मुबीं शफ़क़त की रिदा की बात करें हो 'अज़मत-ओ-रिफ़'अत कैसे बयाँ मे'राज तलक हैं जा पहुँचे हम साक़ी-ए-आब-ए-कौसर के अख़्लाक़-ओ-अदा की बात करें हम जैसे गुनहगारों के लिए वो रब से सिफ़ारिश कर देंगे बहबूद की जो गूँजी है, फ़िज़ा ! उस हक़ की निदा की बात करें शा'इरा: फ़िज़ा फ़ानिया ना'त-ख़्वाँ: मुफ़्ती अनस यूनुस kuchh der to baiTho, ahl-e-dil ! ham noor-e-huda ki baat kare.n sarkaar-e-do-'aalam salle-'ala mahboob-e-KHuda ki baat k...

वलवला-ए-इश्क़-ओ-उल्फ़त आया क़ुर्बानी का दिन / Walwala-e-Ishq-o-Ulfat Aaya Qurbani Ka Din

क़ुर्बानी है रब के लिए और शुक्राना सब के लिए वलवला-ए-'इश्क़-ओ-उल्फ़त, आया क़ुर्बानी का दिन ये है इब्राहीमी सुन्नत, आया क़ुर्बानी का दिन क़ुर्बानी है रब के लिए और शुक्राना सब के लिए आया क़ुर्बानी का दिन, आया क़ुर्बानी का दिन आया क़ुर्बानी का दिन, आया क़ुर्बानी का दिन जानवर और माल का सदक़ा हैं ये क़ुर्बानियाँ होगी घर-भर की हिफ़ाज़त, आया क़ुर्बानी का दिन क़ुर्बानी है रब के लिए और शुक्राना सब के लिए आया क़ुर्बानी का दिन, आया क़ुर्बानी का दिन आया क़ुर्बानी का दिन, आया क़ुर्बानी का दिन है हदीस-ए-मुस्तफ़ा और हिस्सा-ए-क़ुरआन है ये है क़ुर्बानी 'इबादत, आया क़ुर्बानी का दिन क़ुर्बानी है रब के लिए और शुक्राना सब के लिए आया क़ुर्बानी का दिन, आया क़ुर्बानी का दिन आया क़ुर्बानी का दिन, आया क़ुर्बानी का दिन ऐ उजागर ! ख़ुश-दिली से जानवर क़ुर्बान कर मिलती है अल्लाह की क़ुर्बत, आया क़ुर्बानी का दिन क़ुर्बानी है रब के लिए और शुक्राना सब के लिए आया क़ुर्बानी का दिन, आया क़ुर्बानी का दिन आया क़ुर्बानी का दिन, आया क़ुर्बानी का दिन शायर: अल्लामा निसार अली उजागर ना'त-ख़्वाँ: हाफ़िज़ ग़ुलाम मुस्तफ़ा क़ादरी ...

इस बरस हज न हम कर सके हैं | आह महरूम हज से हुए हैं / Is Baras Hajj Na Hum Kar Sake Hain | Aah Mehroom Hajj Se Hue Hain

इस बरस हज न हम कर सके हैं आह ! महरूम हज से हुए हैं अपनी क़िस्मत पे हम रो रहे हैं आह ! महरूम हज से हुए हैं इस बरस हज न हम कर सके हैं आह ! महरूम हज से हुए हैं याद 'अर्फ़ात की आ रही है वो खड़े हो के तुझ को मनाना सब ख़यालों में नक़्श आ रहे हैं आह ! महरूम हज से हुए हैं इस बरस हज न हम कर सके हैं आह ! महरूम हज से हुए हैं उन से पूछो जो हज पर चले थे जम'अ ज़ाद-ए-सफ़र कर रहे थे नज़्र हालात वो हो गए हैं आह ! महरूम हज से हुए हैं इस बरस हज न हम कर सके हैं आह ! महरूम हज से हुए हैं साल भर हज के वो मुंतज़िर थे कितनी मुश्किल से दिन कट रहे थे जीते-जी अब तो वो मर गए हैं आह ! महरूम हज से हुए हैं इस बरस हज न हम कर सके हैं आह ! महरूम हज से हुए हैं आक़ा ! किस से कहूँ अपनी बिपता कौन ज़ख़्मों पे मरहम रखेगा तेरे दर पर भी न आ सके हैं आह ! महरूम हज से हुए हैं इस बरस हज न हम कर सके हैं आह ! महरूम हज से हुए हैं बख़्त ऐसा उजागर 'अता हो हर बरस हज का मौसम लिखा हो हाल-ए-दिल कह के हम रो रहे हैं आह ! महरूम हज से हुए हैं इस बरस हज न हम कर सके हैं आह ! महरूम हज से हुए हैं शायर: अल्लामा...

तू सब को हज पे बुला रहा है | मुझे भी हज पे बुला ले मौला / Tu Sab Ko Hajj Pe Bula Raha Hai | Mujhe Bhi Hajj Pe Bula Le Maula

तू सब को हज पे बुला रहा है मुझे भी हज पे बुला ले, मौला ! तुझे मुहम्मद का वासिता है मुझे भी हज पे बुला ले, मौला ! ज़बाँ पे लब्बैक की सदा हो करूँ हरम का तवाफ़ मैं भी यही तमन्ना है मेरे दिल की ये इज़्न मुझ को भी दे, ख़ुदाया ! हो सामने तेरा प्यारा का'बा पियूँ मैं ज़मज़म का जाम, मौला ! शरफ़ 'अता कर मुझे भी, मौला ! है वासिता तुझ को मुस्तफ़ा का ग़िलाफ़-ए-का'बा से मैं लिपट कर दु'आएँ माँगूँ मैं ख़ूब रोऊँ मु'आफ़ी माँगूँ मैं तुझ से, मौला ! तू बख़्श देना मुझे, ख़ुदाया ! मिना-ओ-मुज़्दलिफ़ा और 'अरफ़ात - के भी जल्वों को देखूँ, मौला ! करम ये फ़रमा दे तुझ को, मौला ! है वासिता बिन्त-ए-मुस्तफ़ा का मैं चूमूँ प्यारा वो संग-ए-अस्वद मुझे भी हासिल हो ये स'आदत ऐ ख़ालिक़-ए-कुल ऐ मालिक-ए-कुल ! ये पूरी कर दे मेरी तमन्ना हरम से हो कर मदीने जाऊँ जहाँ पे सरदार-ए-दो-जहाँ हैं पकड़ के उन की सुनहरी जाली तलब करूँ सदक़ा पंजतन का है आरज़ू उन के दर पे जाऊँ मैं हाल दिल का उन्हें बताऊँ जब उन की चौखट पे सर को रक्खूँ हो ख़ातिमा मेरी ज़िंदगी का शरफ़ दे शौक़-ए-फ़रीदी को भी दर-ए-शह-ए-दीं पे हाज़िरी...

अल्लाह की रिज़ा है गर आप को जो पानी | कर लीजिए क़ुर्बानी / Allah Ki Riza Hai Gar Aap Ko Jo Paani | Kar Lijiye Qurbani

'ईद-ए-क़ुर्बान मुबारक ! 'ईद-ए-क़ुर्बान मुबारक ! मुबारक मुबारक मुबारक ! क़ुर्बानी मुबारक ! क़ुर्बानी क़ुर्बानी क़ुर्बानी क़ुर्बानी अल्लाह की रिज़ा है गर आप को जो पानी कर लीजिए क़ुर्बानी, कर लीजिए क़ुर्बानी सुन्नत अदा करेंगे, राज़ी ख़ुदा करेंगे हुक्म-ए-ख़ुदा पे जानें अपनी फ़िदा करेंगे इख़्लास दिल में हो और हो जज़्बा-ए-ईमानी कर लीजिए क़ुर्बानी, कर लीजिए क़ुर्बानी 'ईद-ए-क़ुर्बान मुबारक ! 'ईद-ए-क़ुर्बान मुबारक ! मुबारक मुबारक मुबारक ! क़ुर्बानी मुबारक ! हुक्म-ए-ख़ुदा मिला जब रब के ख़लील को क़ुर्बान कर दो अपने तुम इस्मा'ईल को हुक्म-ए-ख़ुदा के आगे ख़म कर दी है पेशानी कर लीजिए क़ुर्बानी, कर लीजिए क़ुर्बानी 'ईद-ए-क़ुर्बान मुबारक ! 'ईद-ए-क़ुर्बान मुबारक ! मुबारक मुबारक मुबारक ! क़ुर्बानी मुबारक ! बेटा है ऐसा बेटा रब के ख़लील का मक़बूल है वो बंदा रब्ब-ए-जलील का क़ुर्बान मुझ को कर दे, ऐ मेरे बाबा जानी ! कर लीजिए क़ुर्बानी, कर लीजिए क़ुर्बानी 'ईद-ए-क़ुर्बान मुबारक ! 'ईद-ए-क़ुर्बान मुबारक ! मुबारक मुबारक मुबारक ! क़ुर्बानी मुबारक ! रब के हबीब का भी फ़रमान है यही फ़रहान ! हमा...

काबा दिखा दे मौला / Kaba Dikha De Maula

का'बा दिखा दे, मौला ! मौला ! का'बा दिखा दे, मौला ! 'उम्र बची है मेरी कहाँ मर ही न जाऊँ, मौला ! यहाँ का'बा दिखा दे, मौला ! मौला ! का'बा दिखा दे, मौला ! कभी गिर्द का'बे के मैं भी तो घूमूँ कभी मैं भी का'बे की चादर को चूमूँ मुझे भी दिखा दे, ख़ुदाया ! हरम वो बरसती है रहमत की बारिश जहाँ का'बा दिखा दे, मौला ! मौला ! का'बा दिखा दे, मौला ! कभी संग-ए-असवद का बोसा 'अता हो कि मरने से पहले ख़तम हर ख़ता हो तमन्ना, मेरे रब ! ये पूरी तू कर दे इसी जुस्तुजू में हूँ जीता यहाँ का'बा दिखा दे, मौला ! मौला ! का'बा दिखा दे, मौला ! मैं अक्सर ही यादों में का'बे को पहुँचा मैं कितना हूँ तड़पा, मैं कितना हूँ रोया है बेचैन, मौला ! ये दिल मेरा कितना करूँ कैसे मैं ये लबों से बयाँ ? का'बा दिखा दे, मौला ! मौला ! का'बा दिखा दे, मौला ! बहुत हो के आए हैं देखो वहाँ से कि मैं सिर्फ़ जा ही न पाया यहाँ से ज़ियारत हरम की है कितनों ने कर ली तेरी अब निगाह-ए-करम हो यहाँ का'बा दिखा दे, मौला ! मौला ! का'बा दिखा दे, मौला ! बहुत लोग जाते हैं ...