किस को मालूम है किस को है ये पता / Kis Ko Maloom Hai Kis Ko Hai Ye Pata
किस को मा'लूम है, किस को है ये पता रब त'आला को महशर में क्या चाहिए हर किसी को ख़ुदा की रज़ा चाहिए और ख़ुदा को नबी की रज़ा चाहिए कैसे ईमाँ बचाएँ ये रहता है ग़म सब को अपनी पड़ी है, कहाँ जाएँ हम ऐसे हालात में और इस दौर में फिर बरेली का अहमद रज़ा चाहिए थे बहत्तर मगर दबदबा याद कर है हुसैनी तो फिर कर्बला याद कर ज़ुल्म का सर यहाँ काटने के लिए दिल में शब्बीर का हौसला चाहिए गिरते गिरते यक़ीनन सँभल जाएगा मेरा दा'वा है ग़म से निकल जाएगा कामयाबी क़दम चूम लेगी तेरे शर्त है बाप-माँ की दु'आ चाहिए वो मुजाहिद मेरा अरशद-उल-क़ादरी काश ! आ जाते अख़्तर रज़ा अज़हरी हर तरफ़ से ये आने लगी फिर सदा सुन्नियत को वही क़ाफ़िला चाहिए छोड़ कर मुस्तफ़ा को कहाँ जाएगा देखना रोज़-ए-महशर में पछताएगा दामन-ए-मुस्तफ़ा आज ही थाम ले ख़ुल्द में गर तुझे दाख़िला चाहिए रब ने क़ुरआन में कर दिया फ़ैसला 'इश्क़ होगा नबी से तो होगा भला जितने गुस्ताख़ हैं, जाएँगे नार में ख़ुल्द को 'आशिक़-ए-मुस्तफ़ा चाहिए मेरे सरकार का जो सना-ख़्वान है शा'इरों में अलग जिस की पहचान है झूम कर ना'त पढ़ता है हर बज़्म में इस लिए ...