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मौला तू दे सआदत हज पर बुला ले मौला / Maula Tu De Saadat Hajj Par Bula Le Maula

मौला ! तू दे स'आदत, हज पर बुला ले, मौला ! का'बे की हो ज़ियारत, हज पर बुला ले, मौला ! लाखों हैं जाने वाले, लाखों ही रह गए हैं है सब दिलों की हसरत, हज पर बुला ले, मौला ! कहने को दूर हैं हम, दिल है मगर वहाँ पर ये ख़्वाब हो हक़ीक़त, हज पर बुला ले, मौला ! हज की लगन हो दिल में, एहराम हो बदन पर लब पर हो तेरी मिदहत, हज पर बुला ले, मौला ! 'अर्फ़ात का हो मंज़र, माँगूँ दु'आएँ रो कर बख़्शिश की दे ज़मानत, हज पर बुला ले, मौला ! मुज़दल्फ़ा का हो डेरा, हो हाजियों का फेरा मुझ पर भी कर दे रहमत, हज पर बुला ले, मौला ! रहमत के इस जबल पर हाज़िर हो ये, उजागर ! ऐसी मिले इजाज़त, हज पर बुला ले, मौला ! शायर: अल्लामा निसार अली उजागर ना'त-ख़्वाँ: हाफ़िज़ अनस रज़ा अत्तारी maula ! tu de sa'aadat, hajj par bula le, maula ! kaa'be ki ho ziyaarat, hajj par bula le, maula ! laakho.n hai.n jaane waale, laakho.n hi reh gaye hai.n hai sab dilo.n ki hasrat, hajj par bula le, maula ! kehne ko door hai.n ham, dil hai magar wahaa.n par ye KHwaab ho haqeeqat, hajj par bula le,...

या रब्बना इर्हम-लना | तेरे घर के फेरे लगाता रहूँ मैं / Ya Rabbana Irhamlana | Tere Ghar Ke Phere Lagata Rahun Main

या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना तेरे घर के फेरे लगाता रहूँ मैं सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना हरम में, मैं हाज़िर हुआ बन के मुजरिम ये लब्बैक ना'रा लगाता रहूँ मैं सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना मैं लेता रहूँ बोसा-ए-संग-ए-अस्वद यूँ दिल की सियाही मिटाता रहूँ मैं सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना इलाही ! मैं फिरता रहूँ गिर्द-ए-का'बा यूँ क़िस्मत की गर्दिश मिटाता रहूँ मैं सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना लिपट कर गले लग के मैं मुल्तज़म से गुनाहों के धब्बे मिटाता रहूँ मैं सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना बराहीम के नक़्श-ए-पा चूम कर मैं निगाहों से दिल में बसाता रहूँ मैं सदा शहर-ए-मक्का में आता रहूँ मैं या रब्बना ! इर्ह़म-लना, या रब्बना ! इर्ह़म-लना हतीम-ए-हरम में नमाज़ों को पढ़ कर तेरे दर पे दुखड़े सुनाता रहूँ मैं सदा ...

जब मदीने जाएँगे हम मुस्कुराते जाएँगे / Jab Madine Jayenge Hum Muskurate Jayenge

जब मदीने जाएँगे, हम मुस्कुराते जाएँगे जब वहाँ से आएँगे, आँसू बहाते आएँगे झोलियाँ भर लेंगें उन की रहमतों से हम वहाँ फूल जितने भी खिलेंगे, हम उठाते जाएँगे सिर्फ़ आँसू हैं हमारे पास और कुछ भी नहीं हाल अपना अपनी आँखों से सुनाते जाएँगे शहर-ए-तयबा तेरा मंज़र कोई भी धुँदला न हो अपने आँसू अपनी आँखों में छुपाते जाएँगे लौट आएँगे वहाँ से हम ब-ज़ाहिर, सा'दिया ! दिल में यादों के हज़ारों घर बनाते जाएँगे ना'त-ख़्वाँ: हाफ़िज़ मज़हर क़ादरी अशरफ़ी jab madine jaaenge, ham muskuraate jaaenge jab wahaa.n se aaenge, aansu bahaate aaenge jholiyaa.n bhar lenge un ki rahmato.n se ham wahaa.n phool jitne bhi khilenge, ham uThaate jaaenge sirf aansu hai.n hamaare paas aur kuchh bhi nahi.n haal apna apni aankho.n se sunaate jaaenge shehr-e-tayba tera manzar koi bhi dhundla na ho apne aansu apni aankho.n me.n chhupaate jaaenge lauT aaenge wahaa.n se ham ba-zaahir, Saa'diya ! dil me.n yaado.n ke hazaaro.n ghar banaate jaaenge Naat-Khwaan: Hafiz Mazhar Qadri Ashrafi Ja...

या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा तू मुझे हज पे बुला / Ya Rabb-e-Mustafa Tu Mujhe Hajj Pe Bula

या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ! तू मुझे हज पे बुला आ के मैं देख लूँ आँख से का'बा तेरा या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! हज का शरफ़ हो फिर 'अता, या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ! मीठा मदीना फिर दिखा, या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ! या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ! तू मुझे हज पे बुला आ के मैं देख लूँ आँख से का'बा तेरा या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! रुख़ सू-ए-का'बा, हाथ में ज़मज़म का जाम हो पी कर करूँ मैं फिर दु'आ, या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ! या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ! तू मुझे हज पे बुला आ के मैं देख लूँ आँख से का'बा तेरा या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! रोती रहे जो हर घड़ी 'इश्क़-ए-रसूल में वो आँख दे दे, या ख़ुदा या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ! या रब्ब-ए-मुस्तफ़ा ! तू मुझे हज पे बुला आ के मैं देख लूँ आँख से का'बा तेरा या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! या अल्लाह या अल्लाह ! दे दे तवाफ़-ए-ख़ाना-ए-का'बा का फिर शरफ़ फ़रमा ये प...

दरबार-ए-रिसालत की कैसी वो घड़ी होगी / Darbar-e-Risalat Ki Kaisi Wo Ghadi Hogi

दरबार-ए-रिसालत की कैसी वो घड़ी होगी हस्सान के होंटों पे जब ना'त-ए-नबी होगी बू-बक्र-ओ-'उमर होंगे, 'उस्मान-ओ-'अली होंगे हसनैन के नाना की क्या बज़्म सजी होगी आक़ा हैं क़मर लेकिन असहाब सितारे हैं उस चाँद की हर जानिब तारों की लड़ी होगी जाएँगे मदीने हम, ले जाएगा जब अल्लाह दिल सज्दा-कुना होगा, आँखों में झड़ी होगी जब वादी-ए-ताइफ़ में रंगीन हुए जूते 'अर्शों पे फ़रिश्तों के दिल पर भी बनी होगी जब उहुद-ओ-बदर वाले आक़ा पे हुए क़ुर्बां ख़ुश-ख़बरी फिर उन को जन्नत की मिली होगी नशीद-ख़्वाँ: मुहम्मद अनस रहीमी सादिआ मुदस्सिर darbaar-e-risaalat ki kaisi wo gha.Di hogi hassaan ke honTo.n pe jab naa't-e-nabi hogi bu-bakr-o-'umar honge, 'usmaan-o-'ali honge hasnain ke naana ki kya bazm saji hogi aaqa hai.n qamar lekin as.haab sitaare hai.n us chaand ki har jaanib taaro.n ki la.Di hogi jaaenge madine ham, le jaaega jab allah dil sajda-kuna hoga, aankho.n me.n jha.Di hogi jab waadi-e-taaif me.n rangeen hue joote 'arsho.n pe farishto.n ke dil pa...

ऐ मेरे ख़ालिक़ ये इल्तिजा है मुझे भी अपना तू घर दिखा दे / Aye Mere Khaliq Ye Iltija Hai Mujhe Bhi Apna Tu Ghar Dikha De

झुका के सर यही सज्दों में माँगता हूँ दु'आ कि तेरे घर की ज़ियारत का शरफ़ मिल जाए ऐ मेरे ख़ालिक़ ! ये इल्तिजा है, मुझे भी अपना तू घर दिखा दे फ़रीज़ा हज का अदा करूँ मैं, कि हज पे मौला ! मुझे बुला ले ऐ मेरे ख़ालिक़ ! ये इल्तिजा है, मुझे भी अपना तू घर दिखा दे मैं ख़ाना-का'बा के गिर्द घूमूँ, ग़िलाफ़-ए-का'बा को मैं भी चूमूँ मैं तिश्ना-लब हूँ सबील-ए-ज़मज़म, ऐ मेरे मालिक ! मुझे पिला दे ऐ मेरे ख़ालिक़ ! ये इल्तिजा है, मुझे भी अपना तू घर दिखा दे बहुत ही 'आसी हूँ मानता हूँ, तेरी करीमी भी जानता हूँ कि अपने रहम-ओ-करम के सदक़े तू मेरे सारे गुनाह मिटा दे ऐ मेरे ख़ालिक़ ! ये इल्तिजा है, मुझे भी अपना तू घर दिखा दे सफ़ा-ओ-मरवा के दरमियाँ जो, चली थी बीबी जहाँ जहाँ जो मैं हाजरा की 'अज़ीम सुन्नत अदा करूँगा, तू हौसला दे ऐ मेरे ख़ालिक़ ! ये इल्तिजा है, मुझे भी अपना तू घर दिखा दे फ़रीज़ा क़ुर्बानी का अदा हो, कि जिस में शामिल तेरी रज़ा हो मैं चाहता हूँ, ऐ मेरे मौला ! तू जैसा चाहे मुझे बना दे ऐ मेरे ख़ालिक़ ! ये इल्तिजा है, मुझे भी अपना तू घर दिखा दे महीना हज का जो आ रहा है, स'ईद 'आक़िल की इल्त...

काबे पे पड़ी पहली नज़र तुम को मुबारक / Kabe Pe Padi Pehli Nazar Tum Ko Mubarak

का'बे पे पड़ी पहली नज़र तुम को मुबारक ऐ हाजियो ! ये हज का सफ़र तुम को मुबारक मुज़दल्फ़ा है, 'अर्फ़ात है, मर्वा है, सफ़ा है ये पाक ये पाकीज़ा नगर तुम को मुबारक ऐ हाजियो ! ये हज का सफ़र तुम को मुबारक का'बे पे पड़ी पहली नज़र तुम को मुबारक ऐ हाजियो ! ये हज का सफ़र तुम को मुबारक अब और तलब क्या है तेरी ज़ाइर-ए-का'बा है फ़र्श-ए-हरम पर तेरा सर, तुम को मुबारक ऐ हाजियो ! ये हज का सफ़र तुम को मुबारक का'बे पे पड़ी पहली नज़र तुम को मुबारक ऐ हाजियो ! ये हज का सफ़र तुम को मुबारक हैं ख़ाक-ए-मदीना के तेरे हाथ में ज़र्रे ये लाल, ये हीरे, ये गुहर तुम को मुबारक ऐ हाजियो ! ये हज का सफ़र तुम को मुबारक का'बे पे पड़ी पहली नज़र तुम को मुबारक ऐ हाजियो ! ये हज का सफ़र तुम को मुबारक तुम मस्जिद-ए-नबवी के अहाते में खड़े हो ये नूरियों की राह-गुज़र तुम को मुबारक ऐ हाजियो ! ये हज का सफ़र तुम को मुबारक का'बे पे पड़ी पहली नज़र तुम को मुबारक ऐ हाजियो ! ये हज का सफ़र तुम को मुबारक फ़ारूक़ी ! सभी हाजियों से कहते हैं क़ुदसी सज्दों के लिए रब का ये घर तुम को मुबारक ऐ हाजियो ! ये हज का सफ़र तुम को मुबारक क...

आप का मैं उम्मती हूँ ये मेरी क़िस्मत हुज़ूर / Aap Ka Main Ummati Hun Ye Meri Qismat Huzoor

आप का मैं उम्मती हूँ ये मेरी क़िस्मत, हुज़ूर ! मेरे जीवन का है मक़्सद आप से उल्फ़त, हुज़ूर ! मेरा दिल, धड़कन, जिगर, साँसों की मंज़िल आप हैं दर्द की मौजों में इक राहत का साहिल आप हैं जाँ लुटाई जाए जिस पर उस के क़ाबिल आप हैं 'इश्क़ का मक़्सूद हैं, मक़्सद हैं हासिल आप हैं मेरी साँसों की रवानी आप की ख़ातिर, हुज़ूर ! है फ़िदा कुल ज़िंदगानी आप की ख़ातिर, हुज़ूर ! आप का मैं उम्मती हूँ ये मेरी क़िस्मत, हुज़ूर ! मेरे जीवन का है मक़्सद आप से उल्फ़त, हुज़ूर ! आप का हर क़ौल, आक़ा ! मो'तबर मेरे लिए आप के क़दमों का ज़र्रा है क़मर मेरे लिए आप का दीदार मे'राज-ए-नज़र मेरे लिए आप के ना'लैन-ए-अक़्दस ताज-ए-सर मेरे लिए आप से मंसूब हर शय से 'अक़ीदत है, हुज़ूर ! सब से बढ़ कर आप से मुझ को मोहब्बत है, हुज़ूर ! आप का मैं उम्मती हूँ ये मेरी क़िस्मत, हुज़ूर ! मेरे जीवन का है मक़्सद आप से उल्फ़त, हुज़ूर ! है तमन्ना ख़्वाब में उल्फ़त दिखाऊँ आप को कह के, या रूही-व-नफ़्सी मैं बुलाऊँ आप को आप के हस्सान सा गरचे सना-ख़्वाँ मैं नहीं है तमन्ना आप की ना'तें सुनाऊँ आप को 'इश्क़ में बन जाऊँ ऐसा मैं भी दीवाना, हुज़ूर !...

मैं भी आक़ा वो तेरे दर के नज़ारे देखूँ / Main Bhi Aaqa Wo Tere Dar Ke Nazare Dekhun

मैं भी, आक़ा ! वो तेरे दर के नज़ारे देखूँ जितने मंज़र हैं मदीने के वो सारे देखूँ मैं भी, आक़ा ! वो तेरे दर के नज़ारे देखूँ आप के पहलू में लेटे हैं अबू-बक्र-ओ-'उमर रौज़े में आप के वो यार पियारे देखूँ मैं भी, आक़ा ! वो तेरे दर के नज़ारे देखूँ सुब्ह-ओ-शाम आते हैं क़ुदसी भी सलामी के लिए ख़ुल्द के मिलते हैं जिस दर से इशारे देखूँ मैं भी, आक़ा ! वो तेरे दर के नज़ारे देखूँ सब के भरते हैं वहाँ कासे, वो दर है ऐसा कैसे मिलते हैं वहाँ सब को सहारे देखूँ मैं भी, आक़ा ! वो तेरे दर के नज़ारे देखूँ कमली वाले का मैं मँगता हूँ, जहाँ वालो ! सुनो देख कर ग़ैर की जानिब क्यूँ ख़सारे देखूँ मैं भी, आक़ा ! वो तेरे दर के नज़ारे देखूँ बड़ी हसरत है, शहाब ! आक़ा बुलाएँ दर पे अपनी क़िस्मत के चमकते मैं सितारे देखूँ मैं भी, आक़ा ! वो तेरे दर के नज़ारे देखूँ शायर: मुहम्मद शहाबुद्दीन सैफ़ी ना'त-ख़्वाँ: उमेर मुनीर क़ादरी mai.n bhi, aaqa ! wo tere dar ke nazaare dekhu.n jitne manzar hai.n madine ke wo saare dekhu.n mai.n bhi, aaqa ! wo tere dar ke nazaare dekhu.n aap ke pehlu me.n leTe hai.n a...

आक़ा ने बुलाया रौज़े पर कुछ याद रहा कुछ भूल गया / Aaqa Ne Bulaya Roze Par Kuchh Yaad Raha Kuchh Bhool Gaya

आक़ा ने बुलाया रौज़े पर, कुछ याद रहा कुछ भूल गया की 'अर्ज़-ए-तमन्ना रो रो कर, कुछ याद रहा कुछ भूल गया बख़्शिश की तलब के जितने भी मज़मून थे सारे अज़-बर थे गुंबद पे पड़ी जब मेरी नज़र, कुछ याद रहा कुछ भूल गया बातें तो बहुत सी करनी थीं, हर ग़म का मदावा करना था थीं मेरी निगाहें जाली पर, कुछ याद रहा कुछ भूल गया मैं बारगह-ए-हम्ज़ा में गया, कि उन से सिफ़ारिश करवाऊँ थीं उन की निगाहें जब मुझ पर, कुछ याद रहा कुछ भूल गया कुछ 'अर्ज़ शहा से करना थी, कुछ नज़्र वहाँ पे करना थी दरबार-ए-नबी का था वो असर, कुछ याद रहा कुछ भूल गया जन्नत की कियारी भी देखी, मिम्बर का नज़ारा ख़ूब किया जाली पे हुज़ूरी का मंज़र, कुछ याद रहा कुछ भूल गया अश्कों की लड़ी थी चेहरे पर, अल्फ़ाज़ की माला थी लब पर मोती जो लुटाए जी भर कर, कुछ याद रहा कुछ भूल गया आक़ा से शफ़ा'अत जब माँगी, शैख़ैन से भी कुछ 'अर्ज़ किया थे दोनों वहाँ सिद्दीक़-ओ-'उमर, कुछ याद रहा कुछ भूल गया क़दमैन से पहुँचा जाली पर, रहमत के दरीचे खुलते गए था मेरा मुक़द्दर ज़ोरों पर, कुछ याद रहा कुछ भूल गया फिर इतना दिया आक़ा ने मुझे, औक़ात से मेरी बढ़ बढ़ कर गिनता ही...

मेरे आक़ा मदीने में मुझे भी अब बुला लीजे / Mere Aaqa Madine Mein Mujhe Bhi Ab Bula Leeje

इक बार ही दिखा दो, आक़ा ! मुझे मदीना बेशक बना लो, आक़ा ! मेहमान दो घड़ी का मेरे आक़ा ! मदीने में मुझे भी अब बुला लीजे तरसती हैं मेरी आँखें, मुझे रौज़ा दिखा दीजे मेरे आक़ा ! मदीने में मुझे भी अब बुला लीजे महकती हैं वो राहें जिन से, आक़ा ! आप हैं गुज़रे मुझे भी उन गली कूचों में रहने की जगह दीजे मेरे आक़ा ! मदीने में मुझे भी अब बुला लीजे लड़ी साँसों की ये, आक़ा ! न जाने कब बिखर जाए बुला लीजे मदीने और क़दमों में बसा लीजे मेरे आक़ा ! मदीने में मुझे भी अब बुला लीजे दुखों ने घेर रक्खा है, ग़मों की धूप है सर पर ठिकाना गुंबद-ए-ख़ज़रा के साए में 'अता कीजे मेरे आक़ा ! मदीने में मुझे भी अब बुला लीजे मवाजह सामने हो जिस घड़ी, ये दम निकल जाए बक़ी'-ए-पाक ही, आक़ा ! मेरा मदफ़न बना दीजे मेरे आक़ा ! मदीने में मुझे भी अब बुला लीजे 'अक़ीदत से बिना ना'लैन जिस दर सय्यिदा आईं मुझे भी सय्यिदुश्शुहदा की वो चौखट दिखा दीजे मेरे आक़ा ! मदीने में मुझे भी अब बुला लीजे कभी मैं जालियाँ थामूँ बसा कर पंजतन दिल में 'अली-ओ-फ़ातिमा, हसनैन का सदक़ा 'अता कीजे मेरे आक़ा ! मदीने में मुझे भी अब बुला लीजे सि...