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तू ने बातिल को मिटाया ऐ इमाम अहमद रज़ा | फ़ैज़-ए-रज़ा जारी रहेगा / Tu Ne Batil Ko Mitaya Aye Imam Ahmad Raza | Faiz-e-Raza Jari Rahega

तू ने बातिल को मिटाया, ऐ इमाम अहमद रज़ा ! दीन का डंका बजाया, ऐ इमाम अहमद रज़ा ! ज़ोर बातिल का, ज़लालत का था जिस दम हिन्द में तू मुजद्दिद बन के आया, ऐ इमाम अहमद रज़ा ! अहल-ए-सुन्नत का चमन सर-सब्ज़ था, शादाब था ताज़गी तू और लाया, ऐ इमाम अहमद रज़ा ! तू ने बातिल को मिटा कर दीन को बख़्शी जिला सुन्नतों को फिर जिलाया, ऐ इमाम अहमद रज़ा ! ऐ इमाम-ए-अहल-ए-सुन्नत नाइब-ए-शाह-ए-उमम कीजिए हम पर भी साया, ऐ इमाम अहमद रज़ा ! 'इल्म का चश्मा हुवा है मौजज़न तहरीर में जब क़लम तू ने उठाया, ऐ इमाम अहमद रज़ा ! हश्र तक जारी रहेगा फ़ैज़, मुर्शिद ! आप का फ़ैज़ का दरिया बहाया, ऐ इमाम अहमद रज़ा ! है ब-दरगाह-ए-ख़ुदा 'अत्तार -ए-'आजिज़ की दु'आ तुझ पे हो रहमत का साया, ऐ इमाम अहमद रज़ा ! शायर: मुहम्मद इल्यास अत्तार क़ादरी ना'त-ख़्वाँ: मुहम्मद अश्फ़ाक़ अत्तारी मौलाना बिलाल रज़ा क़ादरी असद रज़ा अत्तारी tu ne baatil ko miTaaya, ai imaam ahmad raza ! deen ka Danka bajaaya, ai imaam ahmad raza ! zor baatil ka, zalaalat ka tha jis dam hind me.n tu mujaddid ban ke aaya, ai imaam ahmad raza ! ahl-e-...

दिल से मीलाद हम मनाएँगे / Dil Se Milad Hum Manayenge

दिल से मीलाद हम मनाएँगे दिल से मीलाद हम मनाएँगे हर दुकान, हर मकान सज गया है आज क्या ज़मीन-ओ-आसमान सज गया है आज ये जहान वो जहान सज गया है आज ये मकान ला-मकान सज गया है आज पूरे दिल से, पूरी दुनिया हम सजाएँगे, हम सजाएँगे ज़िंदगी भर जश्न-ए-आक़ा हम मनाएँगे, हम मनाएँगे पूरे दिल से, पूरी दुनिया हम सजाएँगे, हम सजाएँगे होंटों पे मोहब्बत के फ़साने वही लाए अल्लाह की रहमत के ख़ज़ाने वही लाए सरकार ने मख़्लूक़ पे एहसान किए हैं अल्लाह की बख़्शिश के बहाने वही लाए पूरे दिल नाल सारी दुनिया असीं सजावाँगे, असीं सजावाँगे सारी ज़िंदगी जश्न-ए-आक़ा असीं मनावाँगे, गज-वज मनावाँगे पूरे दिल से, पूरी दुनिया हम सजाएँगे, हम सजाएँगे ज़िंदगी भर जश्न-ए-आक़ा हम मनाएँगे, हम मनाएँगे पूरे दिल से, पूरी दुनिया हम सजाएँगे, हम सजाएँगे घर घर में चराग़ाँ करो, झंडे भी लगाओ वो आ गए सरकार हैं जज़्बात जगाओ हालात हों मख़्दूश या महँगाई के 'आलम हर हाल में सरकार का मीलाद मनाओ पूरा दिल सी आखी दुनिया अमें सजावाना, अमें सजावाना ज़िंदगी भर जश्न-ए-आक़ा अमें मनावाना, अमें मनावाना पूरे दिल से, पूरी दुनिया हम सजाएँगे, हम सजाएँगे ज़िंद...

मैं हूँ सुन्नी आला हज़रत से मेरी पहचान है / Main Hun Sunni Aala Hazrat Se Meri Pehchan Hai

रज़ा हमारी जान, रज़ा हमारी जान रज़ा हमारी जान, रज़ा हमारी जान 'इश्क़-ओ-मोहब्बत 'इश्क़-ओ-मोहब्बत आ'ला हज़रत, आ'ला हज़रत 'इल्म-ओ-हिकमत, 'इल्म-ओ-हिकमत आ'ला हज़रत, आ'ला हज़रत मैं हूँ सुन्नी आ'ला हज़रत से मेरी पहचान है मैं हूँ सुन्नी आ'ला हज़रत से मेरी पहचान है अहल-ए-हक़ अहल-ए-मोहब्बत का यही ए'लान है मैं हूँ सुन्नी आ'ला हज़रत से मेरी पहचान है आ'ला हज़रत बू-हनीफ़ा के हुए हैं जा-नशीं जिन के आगे सब फ़क़ीहों की हुई है ख़म जबीं देखिए अहमद रज़ा की क्या ही ऊँची शान है मैं हूँ सुन्नी आ'ला हज़रत से मेरी पहचान है हज़रत-ए-अहमद-रज़ा के 'उर्स की हर-सू है धूम 'आशिक़ान-ए-मुस्तफ़ा का है बरेली में हुजूम 'आम दुनिया में रज़ा का हर तरफ़ फ़ैज़ान है मैं हूँ सुन्नी आ'ला हज़रत से मेरी पहचान है आ'ला हज़रत ने किया 'इश्क़-ए-नबी पर ऐसा काम उन को दुनिया कह उठी 'इश्क़-ओ-मोहब्बत का इमाम 'इश्क़-ए-आक़ा ने रज़ा को कर दिया ज़ीशान है मैं हूँ सुन्नी आ'ला हज़रत से मेरी पहचान है कंज़ुल-ईमाँ और फ़तावा रज़विया लिख कर दिया जो बुज़ुर्गों का 'अक़ीदा था उसे न...

जान-ए-जिनान-ओ-रौनक़-ए-गुलज़ार आ गए / Jaan-e-Jinan-o-Raunaq-e-Gulzar Aa Gaye

लजपाल आ गए ! लजपाल आ गए ! ए पंद्रह सौवाँ ने जश्न-ए-विलादत थाँ थाँ धुम्माँ पै गय्याँ ए पंद्रह सौवाँ ने जश्न-ए-विलादत थाँ थाँ धुम्माँ पै गय्याँ आया सोहणा जग ते ! मरहबा ! मन मोहणा जग ते ! मरहबा ! उम्मत दा वाली ! मरहबा ! जे दी शान निराली ! मरहबा ! पंद्रह सदियाँ तों ! मरहबा ! जेह्दा जश्न ए जारी ! मरहबा ! मरहबा मरहबा मरहबा मरहबा ! जान-ए-जिनान-ओ-रौनक़-ए-गुलज़ार आ गए आज आमिना के घर शह-ए-अबरार आ गए ज़ाहिर हुआ वो जल्वा-ए-सूरत जनाब का क़ुदसी भी लेने सदक़ा-ए-रुख़्सार आ गए ए पंद्रह सौवाँ ने जश्न-ए-विलादत थाँ थाँ धुम्माँ पै गय्याँ ए पंद्रह सौवाँ ने जश्न-ए-विलादत थाँ थाँ धुम्माँ पै गय्याँ अर्ज़-ओ-समा, ज़मान-ओ-मकाँ यक ज़बाँ हैं आज ख़ल्लाक़-ए-काइनात के शहकार आ गए जान-ए-जिनान-ओ-रौनक़-ए-गुलज़ार आ गए आज आमिना के घर शह-ए-अबरार आ गए मेहर-ए-समा, सितारे, क़मर और कहकशाँ ख़ैरात लेने नूर से अनवार आ गए आया सोहणा जग ते ! मरहबा ! मन मोहणा जग ते ! मरहबा ! उम्मत दा वाली ! मरहबा ! जे दी शान निराली ! मरहबा ! पंद्रह सदियाँ तों ! मरहबा ! जेह्दा जश्न ए जारी ! मरहबा ! मरहबा मरहबा मरहबा मरहबा ! ये रस्म-ए-...

मुस्तफ़ा जान-ए-रहमत पे लाखों सलाम / Mustafa Jaan-e-Rehmat Pe Lakhon Salam (Short & Full)

मुस्तफ़ा जान-ए-रहमत पे लाखों सलाम शम'-ए-बज़्म-ए-हिदायत पे लाखों सलाम मेहर-ए-चर्ख़-ए-नुबुव्वत पे रौशन दुरूद गुल-ए-बाग़-ए-रिसालत पे लाखों सलाम शहरयार-ए-इरम, ताजदार-ए-हरम नौ-बहार-ए-शफ़ा'अत पे लाखों सलाम शब-ए-असरा के दूल्हा पे दाइम दुरूद नौशा-ए-बज़्म-ए-जन्नत पे लाखों सलाम 'अर्श ता फ़र्श है जिस के ज़ेर-ए-नगीं उस की क़ाहिर रियासत पे लाखों सलाम फ़त्ह-ए-बाब-ए-नुबुव्वत पे बेहद दुरूद ख़त्म-ए-दौर-ए-रिसालत पे लाखों सलाम हम ग़रीबों के आक़ा पे बेहद दुरूद हम फ़क़ीरों की सरवत पे लाखों सलाम दूर-ओ-नज़दीक के सुनने वाले वो कान कान-ए-ला'ल-ए-करामत पे लाखों सलाम जिस के माथे शफ़ा'अत का सेहरा रहा उस जबीन-ए-स'आदत पे लाखों सलाम जिन के सज्दे को मेहराब-ए-का'बा झुकी उन भवों की लताफ़त पे लाखों सलाम जिस तरफ़ उठ गई दम में दम आ गया उस निगाह-ए-'इनायत पे लाखों सलाम नीची आँखों की शर्म-ओ-हया पर दुरूद ऊँची बीनी की रिफ़'अत पे लाखों सलाम पतली पतली गुल-ए-क़ुद्‌स की पत्तियाँ उन लबों की नज़ाकत पे लाखों सलाम वो दहन जिस की हर बात वह्य-ए-ख़ुदा चश्मा-ए-'इल्म-ओ-हिकमत पे लाखों सलाम वो ज़ब...