कौनैन के दूल्हा के सदक़े में ख़ुदाई है | सुनते हैं कि महशर में तज़मीन के साथ / Kaunain Ke Dulha Ke Sadqe Mein Khudai Hai | Sunte Hain Ke Mehshar Mein With Tazmeen
कौनैन के दूल्हा के सदक़े में ख़ुदाई है महबूब-ए-करीमा ने हाँ शान वो पाई है मौला ने फ़तर्दा की ख़ुश-ख़बरी सुनाई है सुनते हैं कि महशर में सिर्फ़ उन की रसाई है गर उन की रसाई है लो जब तो बन आई है रहमत ने सर-ए-महशर क्या रंग जमाई है सौग़ात-ए-करम देखो ला-तक़्नतू लाई है आक़ा की शफ़ा'अत ने क्या धूम मचाई है मचला है कि रहमत ने उम्मीद बँधाई है क्या बात तेरी, मुजरिम ! क्या बात बनाई है आ'माल-ए-सियह ने जब फिटकार दिया हम को हम क्या कहें अपनों ने क्या प्यार दिया हम को माँ-बाप ने भी, आक़ा ! धुतकार दिया हम को सब ने सफ़-ए-महशर में ललकार दिया हम को ऐ बेकसों के आक़ा ! अब तेरी दुहाई है सरकार की 'अज़मत का जब ज़िक्र-ए-जली छेड़ो बाज़ार-ए-मोहब्बत में फिर होश-ओ-ख़िरद भेजो गुलदस्ता-ए-तन-मन-धन हर चीज़ ही, ऐ लोगो ! यूँ तो सब उन्हीं का है पर दिल की अगर पूछो ये टूटे हुए दिल ही ख़ास उन की कमाई है यूँ बज़्म-ए-मोहब्बत से हरगिज़ न तू ख़ाली उठ महबूब की चौखट से ले कर के, सवाली ! उठ सरकार-ए-मदीना के ऐ क़ल्ब-ए-फ़िदाई ! उठ ऐ दिल ! ये सुलगना क्या, जलना है तो जल भी उठ दम घुटने लगा, ज़ालिम ! क्या धूनी रमाई है दुनिया की...