नज़ारा हो दरबार का ग़ौस-ए-आज़म / Nazara Ho Darbar Ka Ghaus-e-Azam
नज़ारा हो दरबार का, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! दिखा नीला गुंबद दिखा, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! मुझे जाम-ए-उल्फ़त पिला, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! रहूँ मस्त-ओ-बेख़ुद सदा, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! करम कीजिए फिर मैं बग़दाद आऊँ मेरे पीर का वासिता, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! मुझे अपनी चौखट का कुत्ता बना लो हमेशा रहूँ बा-वफ़ा, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! तेरे आस्ताँ का हूँ मँगता, गुज़ारा है टुकड़ों पे तेरे मेरा, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! गुनाहों का बार अपने सर पर उठा कर फिरूँ कब तलक जा-ब-जा, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! 'इलाज आख़िर ऐ मुर्शिदी कब करेंगे ! गुनाहों के बीमार का, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! गुनहगार हूँ गर 'अज़ाबों ने घेरा तो होगा मेरा हाए क्या, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! नज़र, मुर्शिदी ! तेरी जानिब लगी है 'अज़ाबों से लेना बचा, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! जहाँ में जियूँ सुन्नतों के मुताबिक़ मदीने में हो ख़ातिमा, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! हो 'अत्तार की बे-सबब बख़्शिश, आक़ा ! ये फ़रमाएँ हक़ से दु'आ, ग़ौस-ए-आ'ज़म ! शायर: मुहम्मद इल्यास अत्तार क़ादरी ना'त-ख़्वाँ: आरिफ़ अत्तारी nazaara ho darbaar ka, Gaus-e-aa'zam ! dikha neela gumbad dikha, Ga...